

राष्ट्र नव निर्माण की दिशा में रामराज्य आधारित
ग्राम राज्य अभियान आधार दैशिक शास्त्र
भगवान् पाणिनी के 'रक्षति' सूत्र के अनुसार देश शब्द में 'ठक्' प्रत्यय लगाने से 'दैशिक' शब्द बनता है जिसका अर्थ होता है देश की रक्षा करनेवाला, अत: 'दैशिक शास्त्र' का अर्थ होता है देश की रक्षा करनेवाला शास्त्र |
यदा यदा हि ध्यानेन शुभम् चिंतयति मानवः l तदा तदा हि कल्याणम् भवति नैव संशयः ll
भारत के महान स्वतंत्रता सैनानी श्री अरविन्दो घोष के समकालीन श्री सोमबारी जी महाराज भी स्वतंत्रता संग्राम में अपना पूर्ण मनोयोग से योगदान दे रहे थे। श्री सोमबारी जी महाराज के पिता लाहौर न्यायालय में न्यायाधीश थे। क्रांतिकारी विचारधारा का होने के कारण उनके सामाजिक जीवन के संबंध में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। क्रांतिकारी जीवन के बाद उनका अधिकतर समय शिवालिक एवं हिमालय की पर्वता मालाओं में साधना करते हुए व्यतीत हुआ।
सोमबारी जी महाराज के शास्त्रीय ज्ञान एवं तेज में प्रभावित माननीय श्री बाल गंगाधर तिलक ने उनसे दैशिक शास्त्र के संबंध में चर्चा की। चर्चा में आया कि पूर्व कालों में तो दैशिक शास्त्र भारतीय समाज के जन-जन का मार्गदर्शक हुआ करता था, परंतु मैकाले जैसे दुष्टों के द्वारा जब भारतीय ज्ञान परंपरा का गला घोंट दिया गया तो भारत का वह मूल शास्त्र भी विस्मृत हो गया।
तिलक जी के अनुरोध पर सोमवारी जी महाराज ने पुनः लुप्त हो चुके "दैशिकशास्त्र" को प्रकट करने का बीड़ा उठाया। स्वयं व्यास की भूमिका को अंगीकृत कर चुके सोमबारी जी महाराज को अपने गणेश की खोज थी। उनकी यह खोज श्रीमान बद्री शाह ठुलघरिया जी के रूप में समाप्त हुई। सोमबारी जी महाराज कौशिकी नदी के काकड़ी घाट पर "दैशिकशास्त्र" प्रकट करते गए और ठुलघरिया जी लिखते गए। कुल चार खंडों में दैशिक शास्त्र बनकर तैयार हुआ।
किसी भी समाज व जाति के मार्ग दर्शन के लिये कुछ दिव्य गुण सम्पन्न व्यक्तित्व सर्वदा वान्छनीय होते हैं। वो दैविय गुण कौन कौन से होते है और ऐसे गुण सम्पन्न ऋषि-पुत्र समाज में कैसे पैदा किये जायें, दैशिकशास्त्र इसी विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए है। ऐसे व्यक्ति ही समाज की यथार्थ निधि है। इनका विकास, चयन तथा संरक्षण किसी भी जाति व समाज के लिये अमुल्य है। जीवन को पूर्ण रूप से जीने के लिये चार विभिन्न गुणों की बात की गयी है। इनको हस्तगत करने में कौन जैन सी कठिनाइयों आती हैं तथा उनको कैसे पार कर सकते हैं, दैशिकशास्त्र यहाँ मार्गदर्शन प्रदान करता है।
इस संदर्भ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने 1956 में लिखा थाः
"We should study Daishik Shastra very carefully! Because, Daishik Shastra is the only book of its kind that presents a lucid explanation of both the hoary and contemporary Bharteeya tenet."
परंतु इस महान उपलब्धि पर फिर अंग्रेज़ों की कुदृष्टि पड़ी और इसके तीन खंड कहीं लुप्त हो गए। दैवीय व्यवस्था में इसका एक मात्र उपलब्ध खंड आज हमारे पास है।
आज से १०० वर्ष से भी अधिक कालखंड पूर्व रची गयी इस पुस्तक की दूरदर्शिता को विशेष रूप से मान दिया जाना चाहिये। इस पुस्तक में, स्वतंत्र भारत कैसा हो, उसके वासी कैसे रहें, कैसे विचार करें, जैसी मूल आवश्यकताओं पर ध्यान दिया गया है, जिससे कि भारत राष्ट्र अपने विश्वगुरु रूप को पुनः प्राप्त कर सके। देशवासियों से निवेदन है कि इस पुस्तक को ध्यानपूर्वक पढ़ें, मनन करें तथा राष्ट्र की सच्ची सेवा हेतु जिस भी या जिन-जिन भी गुणों को अपने चरित्र में उतार सकते हैं, उतारें।
मार्गे बाधाम् हरिष्यामि बाधाम् सन्नाशयामि च दैशिक शास्त्र ज्ञानम् अव नंब्य जीवामि सर्व हिताय च|
दैशिक शास्त्र प्रथम सत्र – पदमपुरी आश्रम
नैनीताल (अप्रैल 2025)



दैशिक शास्त्र द्वितीय सत्र – हरिद्वार (2025)

दैशिक शास्त्र द्वितीय सत्र – हरिद्वार- आदरणीय श्री अशोक बेरी जी का मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ।
दैशिक शास्त्र बौद्धि क कार्यक्रम – अल्मोड़ा (2025)
अल्मोड़ा में दैशिक शास्त्र पर राष्ट्रीय नवनिर्माण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री भगत सिंह कोश्यारी जी, श्री तीरथ सिंह रावत जी, श्री शितिज पाटुकुले जी तथा श्री विजय पाल बघेल जी ने दीप प्रज्वलन कर किया। कार्यक्रम का सफल संयोजन श्री सुरेश सुयाल जी द्वारा किया गया।
समारोहक सत्र में डॉ. अर्चना जी द्वारा लिखित त्रिभाषिक दैशिक शास्त्र का विमोचन श्री भगत सिंह कोश्यारी जी, श्री तीरथ सिंह रावत जी द्वारा किया गया। डॉ. अर्चना जी ने बाल गंगाधर तिलक के मित्र श्री नारहरि जोशी जी एवं प्रो. शितिज जी (पुणे) का उल्लेख करते हुए टोली के अन्य सदस्यों के आध्यात्मिक योग से जुड़ने और सक्रिय होने पर बल दिया।






